Friday, 23 May 2014

Today

"ये दिन"

इस लम्हे में छुपा कैसा ये राज़ है?
सब कुछ इस मेहफिल में साज़ है,
दिल कहे यहीं रह जाऊं,
कल माँगता  नहीं वो,
दूर चले जाये सब अपने,
ऐसे पल चाहता नहीं वो। 

गुज़रते वक़्त को थाम दूं,
क्या इतना हक़ नहीं मेरा?
दर लगता है अँधेरे से,
क्या पता, ले जाए सब कुछ कोई नया सवेरा?

ये जो हाथ पकड़े हुए है, जकड़े हुए है,
उन्हें किसी के हवाले नहीं कर सकता मैं,
कल क्या पता क़र्ज़ माँग ले सब कुछ का,
सच तो ये है, नहीं भर सकता मैं। 

मुश्किल है ये, मालूम है मुझे,
पर यही, यही ज़िन्दगी है मेरी,
वक़्त न सुनता किसी की,
यही गिला है मेरी। 

"मैं छोड़ आया सब",
ये कह, रोना नहीं चाहता,
बस, और कुछ नहीं,
सिर्फ इस दिन को खोना नहीं चाहता। 

Wednesday, 9 April 2014

Mother

"माँ"

माँ, तू ने तेरी ममता का कोना-कोना दिखाया है,
हर पहेली का पहलु बताया है,
स्वर्ग सी तेरी आँचल की  माया है,
रौशनी भरा तेरा ये कैसा साया है?

मरहम है तू हर घाव को,
लहर है तू, मेरी ज़िन्दगी-ऐ-नाव को,
आँखों में तेरी एक अद्भुत चमक है,
मैं पंछी बेखबर और तू ही फलक है। 

हर हरकत की तू सहेली है,
हर शैतानी, हर ख़ुराफ़ात तू ने मुस्कान की शिद्दत से झेली है,
सरहाना मेरी कोशिशों को, तेरे दिन का एक हिस्सा है,
तू एक अमूल्य और अवाक किस्सा है। 



तेरी गोद ही अक्सर मेरा बिस्तर हुआ करती थी,
मेरी खामोशी से तू हरदम डरती थी,
तुझे खोते ही, दुनिया ज़ालिम लगती थी,
एक एक पल वें साँसें सुलगती थी। 

तेरे कलेजे का सुकून अब भी ढूँढता हूँ मैं,
इसी चक्कर में आँखें मूँदता हूँ मैं। 

जिस प्राण में भरा हो सिर्फ प्रेम,
उसकी हर आदत खूबसूरत कितनी होगी?
जिस इंसान के चरणों में स्वर्ग बसा हो,
उसके शीर्ष की कीमत क्या होगी? 



Monday, 31 March 2014

Freedom, as it opens us.

"आज़ादियाँ"

 न आए जब तक, बेबस बनाती है हमें आज़ादियाँ ,
न मिले जब तक, दूर करती है मंज़िल से हमें आज़ादियाँ,
होती है यहीं-कहीं,
पर नज़रों में मुश्किल से आती है ये आज़ादियाँ। 

जब मिल जाए ये,
उस पल जीना सिखाती है आज़ादियाँ,
ज़िन्दगी की तस्वीर में रंग भरती है आज़ादियाँ,
समय को खुद का वारिस बताती है आज़ादियाँ,
खेदों को अलविदा करती है आज़ादियाँ। 



धरती तो है छोटी सी,
आसमान के घेर का मंज़र देती है आज़ादियाँ,
होती बहुत खूबसूरत है ये,
बस कुछ वक़्त लेती है आज़ादियाँ। 

Tuesday, 11 March 2014

Experiments with myself

"खुद को सँवारा"

खुराफातें की मैंने खुद से,
आँख दोबारा मिलाई,
भुला सब कुछ जैसे,
आहटें दिल की जलाई। 

आशाओं का हटा दिया, मन में जो था बसेरा,
अब बचा था सिर्फ मैं और पास पड़ा था समय का ढेरा। 

पहले अक्सर जीने कई चाहत में, खुद को घायल किया मैंने,
होश ज़िन्दगी का पाने के लिए, खुद को कायल किया मैंने। 

हर बार से कुछ अलग था ये एहसास,
जितना गहरा गया, उतना खुद को निहारा मैंने,
धुंधला कर हालातों को,
खुद को सँवारा मैंने।